फुर्सतनामा


रिपोर्टर की डायरी-5(चिन्गारी)
अगस्त 10, 2009, 10:51 पूर्वाह्न
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रिपोर्टर की डायरी-5
ट्रीं………….ट्रीं………………ट्रीं………………….. डोरबेल की तेज आवाज ने रोजी की नींद तोड़ी,, सुबह सुबह कौन आ मरा…कहते हुए उठी रोजी ने तुरऩ्त गाउन पहनते हुए घड़ी देखी तो पता चला सवा ग्यारह बज रही थी। ओ माई ग़ॉड आज तो वक्त का पता ही नहीं चला, आती हूं बाबा,, और रोजी ने दरवाजा खोला तो विक्रम अपने सारे माल असबाब के साथ दरवाजे पर खड़ा था। अरे तुम…। क्यों,, । तुम ने ही तो बुलाया था सो आ गया..इतने कहते हुए विक्रम अपने सामान के साथ अन्दर घुस आया। पर कल तो तुम मना कर रहे थे…। जाने क्या क्या कह रहे थे। यहां वहां बिखरे अपने कपड़े समेटते हुए रोजी बोली.. कम से कम मुझे फोन तो कर देते, जानते हो न ऐसे बिना बताए आना कर्टसी के खिलाफ होता है।,, यह कहते हुए उसके होठों पर शरारती मुस्कान तैर रही थी। अरे वो राजेश का बच्चा,, आज सुबह ही सविता के साथ कमरे पर आ धमका,, कहने लगा,, यार हमने आज ही मैरिज करने का प्लान बना लिया है.. तू कुछ व्यवस्था देख.. ज्यादा नहीं तो तीन चार दिन का जुगाड़ तो कर,, फिर वापस आ जाना,, मैंने कहा चलो तीन चार दिन की ही बात है तो रोजी के यहां ही चलता हूं।,, क्यों ठीक किया न। बिल्कुल ठीक किया,, तुम ऐसा करो बाहर वाले कमरे में अपना डेरा जमा लो.. मैं तैयार हो कर ऑफिस के लिए निकल रही हूं। किचन में जो चाहो बना खा लेना,, कहीं जाओ तो चाबी डोरमेट के नीचे डाल देना,..। मैं तो देर रात को ही आउंगी। इतना कहते हुए वो तुरन्त बाथरूम में घुस गई। हकबकाया विक्रम बाहर वाले कमरे में ( दो कमरों के इस फ्लैट में एक कमरा बालकनी वाला था, और दूसरा बाहरवाला कहलाता था.शायद कॉमन ड्राइंग डायनिंग के पास होने के कारण उसे बाहरवाला कहा जाता था।)अपना सामान रख कर कमरे का जायजा लेने लगता है।इतने में रोजी की आवाज आती है.. तुम चाय पियोगे.,.. हां… तो किचन में बना लो..मेरे लिए भी बना देना प्लीज.. मुझे जरा देर हो रही है.. वरना मैं ही बना देती,.. नहीं नहीं कोई बात नहीं.. मैं बना देता हूं। वह किचन में जाने के लिए बाहर निकलता है.. और इतने में ही रोजी नहा कर तौलिया लपेटे बाथरूम से निकलती है। रोजी को यूं सामने देख विक्रम अचकचा जाता है। रोजी के कंधे तक के बालों में पानी चू रहा था. उसके चेहरे और गालों पर जगह जगह पानी की बूंदे ठहरी हुई थी… । विक्रम को यूं घूरता देख रोजी बोली,. ,, ऐ, क्या घूर रहे हो,, मुझे कभी देखा नहीं क्या,, देखा तो बहुत बार है,, पर यों नहीं,,इतना कहते कहते विक्रम झेंप कर फर्श में नजरें गढ़ाता हुआ रसोई का रुख कर लेता है और रोजी अपने कमरे का। किसी चीज की शुरूआत हो चुकी थी,, कहीं चिन्गारी को हवा मिल चुकी थी,,।
रोजी जैसे ही मीटिंग हॉल मे पहुंची तो देखती है सारे रिपोर्टर आ चुके थे और उसी का इन्तजार हो रहा था। उसे देखते ही अमित सिंह जो उनका बॉस था, बोला,,,, क्यों रोजी रात फिर ज्यादा हो गई थी क्या,,,, क्या अमित तुम हर समय यूं क्यों टीज करते हो। तुम्हें क्यों चिढ़ होती है मेरी पर्सनल लाइफ से .. अरे बाबा नाराज क्यों हो रही हो,.. तुम से जरा सा भी मजाक नहीं कर सकते क्या,., टाइम देख रही हो.. साढ़े दस की मीटिंग में तुम साढ़े ग्यारह आ रही हो। यहां क्या क्या प्लान हुआ अब सब तुम्हें बताओ,,. तुमको पता है तुम इन सबकी चीफ हो, और तुम ही इर रेगुलरेटी करोगी तो कैसे काम चलेगा.. तो मैंने कहा था मुझे चीफ बनाओ,, मैंने तो मना ही किया था.. पता नहीं क्यों जबरदस्ती चीफ का तमगा पहना दिया। खैर बताओ,.,. आज क्या है.. वो आज पोलो फेस्टिवल का फाइनल है.,. तुम्हें तो पता ही बॉलीवुड के सारे स्टार आ रहे हैं। उन पर स्टोरी करनी है.. । नहीं हो सकती,,.रोजी का सपाट जवाब था..। अरे ऐसे कैसे नहीं होगी.. तुम कोशिश तो करो.. । कल से कोशिश ही कर रही हूं। सब को फोन कर दिया, कोई भी तैयार नहीं है,. टाइम तो बहुत दूर की बात है कोई घुसने तक नहीं देगा। होटल के मैनेजर ने पहले खुद ही चला कर कह दिया,. रोजी डियर, इस बार जिद मत करना,, मेरे जॉब का सवाल है,, और वो जो होस्ट है,, वो तो ऐसे फूल रहा है जैसे इस फेस्टीवल के बाद उसे लोकल मीडिया कवरेज की जरूरत ही नहीं है। साला फोन तक अटेंड नही कर रहा । मैं कुछ नहीं जानता। अमित ने अपना निर्णय सुनाते हए कहा… आज इस पर फुल पेज जाएगा और वो भी फ्रन्ट पेज,.। फोटो का इन्तजाम भी करना। चाहो तो किसी को साथ ले लो। अजय या लोपा मैं से किसी को ले जाओ। चलो अब सब काम पर जुट जाओ,,। फुल पेज जाएगा,, हुंह,, कहां से लाउं फुल पेज ,, मेरा फोटो छाप दो , खूब बिकेगा,,। चलो अजयकुमार, मेरे राजकुमार अपनी लोपा को भी बुलाओ हम मिल कर लव का ट्रायगल बनाते हैं। शाम तक कुछ तो निकलेगा ही। मैं जरा फ्रेश हो कर आती हूं तब तुम सोर्स खंगालों, कुछ बात बने तो बताना,, हां भल्ला टूर वाले से बात करो कुछ न कुछ जुगाड़ हो ही जाएगा। रोजी के फ्रेश होने का मतलब था,, एक सिगरेट का राख होना और उसके धुंए से अपने खाक होने का इंतजाम करना।
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