फुर्सतनामा


हमसफरःरिपोर्टर की डायरी-4
मार्च 21, 2009, 1:15 पूर्वाह्न
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हमसफरःरिपोर्टर की डायरी-4

कुछ खास नहीं। अभी तो अपने लिए अलग रूम की तलाश में जुटा हुआ हूं। राजेश और सविता जल्द ही शादी करने वाले हैं और राजेश चाहता है वो शादी के बाद इसी फ्लैट में रहे। सो मुझे वहां से बोरिया बिस्तर समेटना ही पड़ेगा। आज ही दिन भर मकान की तलाश मे घूमता रहा हूं पर हर कोई मेरे बैचलर होने का पता चलते ही मुझे टरका देता है। कल फिर जाऊंगा। वाकई मकान ढूंढना भी एक भारी काम है। बहुत थकान महसूस कर रहा हूं। चलो कहीं चल कर कुछ खाया जाए।
दोनों जने विक्रम की बाइक पर सवार हो श्री माया का रूख करते हैं। श्री माया उनका पसंदीदा फूड सेन्टर था। वहां की मलाई मेथी विक्रम और रोजी दोनों को ही बहुत अच्छी लगती थी। अक्सर दोनों की शाम वहां की कोने वाली केबिन में ही गुजरती थी और वेटर से लेकर मालिक तक सभी न केवल उनसे ठीक प्रकार से वाकिफ थे बल्कि वे उनकी पसंद तक जानते थे। अब तो यह हाल हो गया था कि वेटर दोनों से ऑर्डर भी नहीं लेते थे, बल्कि उनके पहुंचते ही सीधे खाना हाजिर कर देते थे। खाना खा चुकने के बाद रोजी ने एकाएक कहा, विक्रम तुम एक काम क्यों नहीं करते।
क्या।
मेरे साथ ही क्यों नहीं रहते।
मजाक मत करो, मैं वैसे ही बहुत परेशान हूं, और कम से कम कमरे को लेकर तो कोई मजाक नहीं, राजेश भी पांच दिन बाद ही शादी करने वाला है। उससे पहले उसे फ्लैट को दुबारा से सजाना है। मुझे तो बस दो दिन में ही कमरा खाली करना है। और तुम मेरी टांग खिंचाई कर रही हो।
मैं टांग खिंचाई नहीं कर रही, आई एम सिरीयस। जब से ऋचा गई है मै भी अकेले रहते रहते बोर हो गई हूँ। तुम रहोगे तो शायद मुझे घर पर रहना कुछ अच्छा लगे।
नहीं यार तुम्हारे घर वाले क्या सोचेंगे। और फिर ऐसे रात दिन साथ रहना ठीक नहीं है।
देखो मम्मी कभी कभी आती हैं, जब वो आएं तब तुम कोई व्यवस्था कर लेना। बाकी लोगों का क्या वो कहें यही तो मैं चाहती हूं। बस अब पक्का हो गया तुम कल अपना सामान लेकर मेरे यहां शिफ्ट हो रहे हो।
चलो कल की कल देखेंगे। अभी तो तुम्हें तुम्हारे रूम पर छोड़कर मैं जाकर सोऊं। मुझे कल एक कैनवास कम्पलीट करना है, और तुम जानती हो मैं ब्रश केवल सुबह सुबह ही चलाता हूं।



आखिर लड़कियों को ऐसा क्यों बनाया…(रिपोर्टर की डायरी-3)
मार्च 18, 2009, 6:55 अपराह्न
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girl2हां, और वो बाकी ही रहेगा,,, क्योंकि तुम मेरे लिए कोई मॉडल नहीं हो जिसको मैं केनवास पर उतार दूं। तुम मेरी भावना हो,, समझी। छोड़ो ये बताओ अभी क्यों बुलाया। अरे वो मन कुछ ठीक नहीं था। कल रात को एक पार्टी की कवरेज में गई थी। वहां निशा ने जबरदस्ती ज्यादा पिला दी। सिर भारी हो रहा था ऊपर से वो अनिरूद्ध हर समय गज भर की लार टपकाता पीछे घूमता रहता है। मुझे उस पर बहुत गुस्सा आता है। सोचती हूं किसी दिन उसकी शिकायत कर दूं। लेकिन उससे क्या होगा। यहां तो साले सब एक जैसे हैं। यहां ही क्यों सभी जगह सारे ही साले एक जैसे ही होते हैं किसी भी लड़की के टैम्परेरी खसम बनने के लिए तैयार। सच कहूं तो इसमें उनका दोष नहीं है। ये साला सब कसूर भगवान का ही है उसने ही ऐसा बनाया है। लड़कियों को बदन ही ऐसा दिया है कि हर कोई उसे गुलाबजामुन की तरह चट कर जाना चाहता है। पर उसने ऐसा क्यों बनाया है ? क्या लड़कियों को इसी लिए बनाया गया है कि वह पुरूष की आवश्यकता की पूर्ति करे, उसकी दिलजोई करे,उसे तरह-तरह से खुश करे। और बाकि बचे समय में भी उसके लिए ही काम करे। उसके कपड़े धोए, खाना बनाए, घर संभाले, बच्चे पैदा करे, और उन्हें बड़ा करे फिर मर जाए। हो गई जिन्दगी। मर्दों की इस चटोरी नजर से बचने के लिए ही तो पहले जमाने की लड़कियों ने अपने आपको बेतुके ढीलेढाले लिबासों में ढंक लिया था। वह जानती थी उसके शारीरिक भालों की नोंक पुरूषों की आंखों में चुभ कर उसी पर कहर बन टूटेंगी। इसलिए अपने प्रकृति की आंख में धूल झोंकने के लिए खुद को ही पर्दानशीं कर लिया।

… पर अब तो ऐसा नहीं है। आज तो लड़कियां हर जगह लीड कर रही हैं। चाहे पॉलिटिक्स हो या कॉरपोरेट सैक्टर कहीं भी देख लो वो सब जगह आगे है। ..

           लीड माई फुट। जिसे तुम लीड कह रहे हो वो केवल दिखावा है। हकीकत मैं यह केवल एक तिलस्म है जो जब टूटता है लड़की को ही पराजित करता है। जो कहीं न कहीं लीड कर रही है वो कहीं जबरदस्त हार का अनुभव भी करती है। कोई एक ऐसा मोर्चा जरूर होता है जहां उसको मन मसोस कर जीना ही पड़ता है। समझौता करना पड़ता है। अपने स्वाभिमान को मिथ्या अभिमान की बलि चढ़ानी ही पड़ती है।

. …. लेकिन तुम तो अपनी शर्तों पर ही जी रही हो न…

              विक्रम तुम नहीं जानते ये अपनी शर्तों वाली सेल्फमेड इमेज के लिए मैंने क्या चुकाया है । छोड़ो फिर कभी बताऊंगी। अभी यह सब रहने दो तुम अपनी बताओ क्या चल रहा है… ।



रिपोर्टर की डायरी-2
मार्च 2, 2009, 1:01 पूर्वाह्न
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सरस पार्लर कहने को केवल आइसक्रीम लस्सी का सरकारी आउटलेट था, लेकिन वहां बहुत खुली जगह पेड़ो का झुरमुट और उनके नीचे लगी बैंचे प्रेमी जोड़ों को बढ़िया और खुला वातावरण देती थीं। रोजी का मैसेज मिलते ही विक्रम तुरन्त वहां पहुंच गया। उसे इन्तजार करते- करते आधे घण्टे से ज्यादा हो चुका था और इस दौरान तीन सिगरेट सुलगा चुका था, लेकिन पता नहीं यह रोजी कहां अटक गई थी। उसे इन्तजार करवाने में मजा आता था और विक्रम को इन्तजार करने में। पार्लर के के एक लैम्प पोस्ट से कंधा टिका कर खड़े खड़े उसे रोजी से अपनी पहली मुलाकात की याद आ गई।… उसकी आर्ट एग्जीबिशन लगी थी। वो बोल्ड स्ट्रोक्स का कायल था। इसलिए उसने बेहद मेहनत कर एक न्यूड सीरीज तैयार की थी। जिसमें अलग अलग एज ग्रुप की महिलाओं को दर्शाया था। उसके हर केनवास में ब्लैक बैकग्राउण्ड के साथ लाल तपता सूरज होता था। हर कोई इसकी तारीफ करता रहा था। उसी दौरान यह लड़की आई और सीधे कहने लगी, यह एग्जीबिशन आपकी है,

-हां,

आपने स्केच तो खूबसूरत बनाएं हैं, पर इन्हें बनाते हुए आप संकोच कर गए। विक्रम एक लड़की के मुंह से यह बात सुन कर दंग रह गया लेकिन दंग रहना अभी बाकी था, उसने आगे कहा, वाकई आपने बहुत अच्छा प्रतीक इस्तेमाल किया है। रात में तपता सूरज। लड़कियां हमेशा यूं ही तपती रहती हैं कोई इन्हें नहीं बुझाता । यह सुन कर चौंकने की बारी विक्रम की थी। सोचने लगा. हां सूरज का इस्तेमाल करते समय उसने कुछ ऐसा ही सोचा था लेकिन कोई लड़की उसे यह समझाएगी इसकी उम्मीद नहीं थी। उसका अगला सवाल था, इन्हें बनाते समय क्या सोचा, कुछ नहीं, बस मजा आया, एक एक स्ट्रोक दिल से लगाया और क्या।… दूसरे दिन हैडिंग था, न्यूड पेंटिग्स बनाने में आया मजाः विक्रम… शहर के एक आर्ट सेंटर में एक पेंटर की एग्जीबिशन लगी है। जिसमें सारे पोट्रेट्स न्यूड हैं। चित्रकार का कहना है कि उसने महिलाओं की भूख को उजागर करने की कोशिश की है। और भी न जाने क्या- क्या लिखा था..। उसे पढ़ते हुए ही विक्रम जबरदस्त तनतमा गया था, लेकिन जाने क्या हुआ था कि पांच दिन से लग रही उसकी एग्जीबिशन के बारे में सुबह से ही हर जानने वाले का फोन आ रहा था, मोबाइल की बैटरी की हालत यह हो गई थी की उसे लगातार चार्ज करना पड़ रहा था। हर कोई पूछ रहा था कहां लगी है, जबरदस्त पेंटिग्स बनाई हैं, करेजियस है,, ये वो. और विक्रम मन ही मन उस अखबार को गरियाने में जुटा था। जैसे-तैसे तैयार हो कर जब एक्जीबिशन खोलने पहुंचा तो, देखा कई लोग उसकी दीर्घा के आस पास मंडरा रहे थे, उसने एग्जीबिशन ओपन की और तुरन्त उस अखबार के दफ्तर में फोन किया। आपके यहां लोकल एडिटर से बात करनी है.. हैलो,, हां,. कहिए मैं ही स्थानीय संपादक हूं …. बताइए आपको क्या काम….. मैं आपके सिटी सप्लीमेंट में पेज तीन पर छपी खबर के बारे में ,,, वो खबर… अरे भाई, सुबह से कितने फोन आ गए खैर वह तो आर्ट सेंटर में लगी है.. और रिपोर्टर रोजी सिंह है ,, मिलना हो तो एक से दो के बीच आर्ट सेंटर में ही मिल लेना,,, । इतना कह कर फोन रख दिया। अब उसे आर्ट सेंटर में रोजी सिंह का इन्तजार करना था,, वह आर्ट सेंटर के रिसेप्शन पर कह आया था कि रोजी सिंह आए तो उसे फोन कर दें। पौन बजे के आस पास वही कल वाली लड़की आती दिखी,, क्या पैंटर साब क्या हाल है,, विक्रम कुछ नहीं बोला .. कैसा लगा आज का अखबार देख कर , मजा आया.,,. अरे मैं क्या जानूं ये अखवार वाले भी कुछ तो भी लिख देते हैं.. मैंने ऐसा कहा ही नहीं, कोई रोजी सिंह है आने दो उसे .. वो बोली, अरे आने क्या दो, मैं तो आ गई और इतना कह विक्रम की टेबिल पर झुकती चली गई। बोलो मजा आया या नहीं। आज देखो तुम्हारी गैलरी कैसी ठसाठस भरी है.. पर मैंने तो .. हां मालूम है तुमने कुछ नहीं कहा, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता हम जर्नलिस्ट तो जो मन में आता है वही लिखते हैं.. समझे.. चलो एक सिगरेट पिलाओ। विक्रम उसे सिगरेट ऑफर करता है., दोनों सिगरेट सुलगाते सुलगाते बाहर आ जाते कि तभी वह बोलती है, विक्रम मेरा एक काम करोगे,, बोलो.. मेरा न्यूड पोट्रेट बनाओगे.. हतप्रभ विक्रम उसकी ओर देखता है ,, और कुछ जवाब देता कि उसके सिर चपत सी पड़ती है और वह यादों की दुनिया से लौट कर हकीकत में आ जाता है.. .देखा तो रोजी खड़ी थी एकदम स्कीन टाइट फिट ड्रेस में,,बोली, चल सिर दुख रहा है, सिगरेट पिला और फिर एक लस्सी भी.. हैंग औवर दूसर करना है,. वैसे क्या सोच रहा है,, कुछ नहीं अपनी पहली मुलाकात के बारे में सोच रहा था,, अच्छा वो .. क्या.. ,,,औऱ उसके चेहरे पर भी मुस्कान तैर गई .,, उसने मुस्कराते हुए कहा.. मेरा पोट्रेट तो अभी बाकी ही है,,,..