फुर्सतनामा


निर्विकारता और वास्तविकता
मई 9, 2008, 11:56 अपराह्न
Filed under: Uncategorized

पिछले कुछ समय का अनुभव वाकई जीवन का नया अनुभव है,लोग खामख्वाह ही विरोध करने में जुटे हैं, मैंने कहीं पढ़ा था,लोग सफलता की खिल्ली उड़ाते हैं, शायद यही दौर चल रहा है। पर वाकई स्वयं पर संयम रखने से बल मिलता है। चक्रव्यूह में अर्जुन सी स्थिति होने पर भी यदि आप लोगों के बाण झेल लेते हैं तो अगला बाण झेलने की ताकत का अहसास होने लगता है। कुछ दिन से मन खिन्नता अनुभव कर रहा था। कुछ सहकर्मी अनावश्यक ही छींटाकशी करने या तंज मार कर अपने आप को बड़ा तीसमार खां साबित करने में जुटे थे। बात बे बात उलझने का प्रयास करने में लगे थे। कई बार मन में जबरदस्त गुस्सा भी आया पर स्वयं नियंत्रण कर बात को अनदेखा कर दिया। अब उन पलों के बारे में ख्याल करता हूं लगता है कि सही किया जो चुप रहा। उनके मुंह लगने का कोई फायदा नहीं। इसमें उनका भी कोई दोष नहीं, कुछ लोग उन्हें ऐसा संदेश दे देते हैं कि वे कुछ ऐसा करें जिससे छवि उग्र बन जाए। बड़े प्रयत्नों से छवि की उग्रता पर काबू पाया है, अब इसी प्रकार अभ्यास करना है ताकि उग्र व्यक्तित्व की छवि में परिवर्तन हो सके। कोशिश जारी है, कुछ साथियों का मत भी है कि पहले की अपेक्षा बहुत शांत रहता हूं। पर क्या किया जाए कि जो लोग जबरन विरोध कर रहे हैं वो विरोध करना बंद कर दें। कुछ साथी ऐसे भी हैं जो जानबूझकर कमजोर साथियों को इस प्रकार के वाक्य कहते हैं कि वे विरोध में सोचना शुरू कर देते हैं। खैर इन सारी बातों का सार वाक्य यही है,,,
लीजिए, यह भी गुजर जाएगा….



hi
मई 9, 2008, 2:53 पूर्वाह्न
Filed under: Uncategorized

once again i am back

from now onwords i will try my best to update this , fursatname ke liye fursat bhi to honi chahiye…. ummid hai milegi…. nahi milegi to nikal lenge.

 समय परिवर्तनशील है, और स्थितियां बदलती रहती हैं,जो आज शाह होते हैं वे कल सड़क पर होते हैं और जो कल सड़क पर थे वे आज शाह हो सकते हैं। पर सड़क से उठकर शाह बनने का यह सफर अक्सर बहुत से लोगों की सदाशयता नतीजा होता है लेकिन यह भी सच है कि कुछ पहचान पा चुके लोग, अपनी पहचान में योगदान देने वालों को श्रेय नहीं देना चाहते।क्योंकि कहीं न कहीं इससे उनकी सेल्फमेड इमेज पर असर पड़ता है। उनका छद्म अहंकार खंडित होता है। शायद यही इन्सानी प्रवृत्ति है कि वह अच्छाई के प्रतिकार में अच्छाई नहीं करता है। पर फिर भी मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि समय बदलता है , यह कथन हमेशा सत्य है,इसलिए स्थितियां हमेशा एक सी नहीं रहती। एक छोटी कहानी है, किसी के सामने संकट था कि वह एक ऐसा कथन ढुंढ़ कर लाए जो अति सुख और अति दुःख दोनों ही स्थितियों में सम्यक अहसास करवाए। अंततः बहुत कठिनाईयों से उसने जो सूत्र ढूंढा वह है-

लीजिए, यह भी गुजर जाएगा….।
वाकई यह बेमिसाल कथन है…..